भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तपती धरती माथै लोर और हां और / सांवर दइया

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तपती धरती माथै लोर और हां और
बरसै भलांई लगा जोर और हां और

ऐकर कीं तो बुझगी आ अछेही तिरस
हरखण लाग्यो मन-चोर और हां और

मन मरजी म्हांरी जमानै रो कांई
हुवण दो जे हुवै शोर और हां और

बस आ घड़ी मिलण री अमर हो जावै
बाढो बिजोग रा थोर और हां और

सांस सागै गुंथ सांस काढै रंग नुंवो
निखरै रूप जाणै भोर और हां और