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तब तक / नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती

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रहने दो, तो फिर रहने दो
सारी वेदनाएँ मन जाएँ
स्मृति के गह्वर में झर जाएँ सारी वेदनाएँ।

अगर इस पर भी
मन भर उठे तुम्हारी स्मृति के स्वाद से
दोनों आँखें अगर छलछला आएँ;
यह हृदय अगर
तब भी तुम्हें याद रखे
अगर जीवित रह जाएँ सारे गीत तब तक
तो तुम लौट आना फिर
मैं रहूँगा यहीं
गीतों से ढँक दूँगा सारे हाहाकार।

तब तक रहने दो
पहले मर जाए यह वेदना
सारी तक्लीफ़ें झर जाएँ
स्मृति के गह्वर में।

मूल बांग्ला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी