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तमाम क़ौल ओ क़सम था मुकर गया है कोई / शाज़ तमकनत

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तमाम क़ौल ओ क़सम था मुकर गया है कोई
मैं रो पड़ा हूँ के जी से उतर गया है कोई

कभी कभी तो ज़राफ़त भी ख़ूँ रूलाती है
हँसी की तरह फ़ज़ा में बिखर गया है कोई

न अब तो दीं में कशिश रह गई न दुनिया में
ये मुझ पे आख़िरी एहसान कर गया है कोई

नहीं है मेज़बाँ जिस का ये कौन मेहमान है
खंडर सी आँखों में आ कर गया है कोई

मैं आप अपनी कर्मी-गाह था शिकार भी था
वो मैं था या मेरा साया था मर गया है कोई