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तरक़्क़ी / एल्विन पैंग / सौरभ राय

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मुझे और ज़्यादा कमरे चाहिए, क़ालीन बिछाने की जगह, चमकते फ़र्श, झुकी हुई घुमावदार छतें, चमकते बड़े बाथरूमों में गर्म पाने के जकूज़ी फ़व्वारे।
रसोई इतनी बड़ी कि जज़ीरा समा जाए, जर्मन स्टील के ख़ूबसूरत बर्तन, आलिशान इंडक्शन हॉब्स, जिनका मैं कभी इस्तेमाल न कर पाऊँ।
दीवार से दीवार तक सौगान लकड़ी की टाइल्स, रूमानी झालर, इतने सारे परदे जिन्हें खोलने में तमाम ज़िन्दगी बीत जाए, इतने बड़े कमरे कि किसी दीवार को गिराकर जगह बड़ी न बनानी पड़े। इतने बड़े कमरे कि दीवारें दिखलाई ही न पड़ें।
मैं अपने सोने के कमरे में जैगुआर कार खड़ी करना चाहता हूँ।
दो जैगुआर। कमरे इतने बड़े हों कि पड़ोसी देखने आएँ, सैलानी घूमने आएँ, सब के ज़ेहन में मेरे लिए इज़्ज़त और जलन दोनों हो। मेरा घर एक राष्ट्रीय धरोहर कहलाए।
जागीर इतनी बड़ी, कि आए दिन मेरे ऊँचे चौखट पर इंजीनियरों की जमात लगे। नए-नए मंसूबों के साथ, कि कैसे मेरे घर का इस्तेमाल कारोबार और मुनाफ़े के लिए किया जा सकता है। और मैं हँसते हुए उन्हें मना करूँ।
मैं इतना दरियादिल होना चाहता हूँ कि तमाम दोस्त अपने कुत्तों को मेरे नौकरों के हवाले छोड़ कर टहलने जा सकें।
मैं एक बड़ा हेलिपैड चाहता हूँ, जहाँ जॉगिंग करते हुए मैं इर्द-गिर्द के दृश्यों से बोर न हो सकूँ। इतना बड़ा, कि पड़ोसियों को देखने के लिए दूरबीन की ज़रुरत पड़े। और इतना ऊँचा, की नंगी आँखों से मैं देख सकूँ समन्दरों के पार।
ज़ाहिर है, एक बड़ा स्विमिंग पूल। ओलिम्पिक साइज। नहीं, झील जितना बड़ा। इतना बड़ा कि चाँद से दिखलाई पड़े, जहाँ मेरे पिता वक़्त बेवक़्त मछली पकड़ने जा सकें। समन्दर का एक प्राइवेट किनारा, जैसा जापान में है, नक़ली लहरों वाला, साल भर ढ़ाई फ़ुट की हलकी लहरें।
जागीर इतनी बड़ी, कि मेरी अपनी एक सरकार हो। इस सबब, अपना संसद, अपनी आवाम, सेना, अपना अलग़ टाइम ज़ोन, जहाँ घड़ियों में हमेशा रविवार शाम के छह बज रहे हों, आसमान में हमेशा सूरज ढल रहा हो।
ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है, हम में कोई ज़िन्दा नहीं रहेगा, फूल कहता है, चींटी कहती है, जिनके घर हमसे बड़े हैं।
बहरहाल, मुझे ऐसी जागीर चाहिए, जिसका अपना मौसम हो, हवा का तापमान तेईस डिग्री सेल्सियस, बादलों से बजाय बारिश के जैज़ बरसता हो।
और मेरे बरामदे में कुछ पहाड़, जिनपर देवदार के दरख़्त बोन्साई की तरह सजे हों। मेरा अपना चाँद, जिसे मैं बल्ब की तरह जब चाहे जला-बुझा सकूँ। सूरज को जब चाहे मद्धिम कर दूँ। और मेरे क्रिसमस के जंगल को सजाने के लिए रात के तसव्वुर से लाए हुए कुछ सितारे।
रात जितने बड़े कमरे। बेहतरीन ख़ामोशी। इतनी ज़्यादा जगह जहाँ मैं सो सकूँ सुक़ून से, और देख सकूँ बेइन्तहा ज़ंजीरों को, सपनों की तरह।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : सौरभ राय