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तरु / जय गोस्वामी / रामशंकर द्विवेदी

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तरु छाया
शब्द को क्या
तुम पुराना मानती हो !

हालाँकि तुम्हें देखते ही
याद आता है —

गाछ नहीं,
तरु की छाया में
स्निग्ध होकर बैठा हूँ ।

तुम जब तक रहती हो,
समझ जाता हूँ,
जीवन एक बार पुनः
नये प्रेम के दोष से
दोषी हो गया है ।

मूल बाँगला भाषा से अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी