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तसव्वुर / अख़्तर-उल-ईमान

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फिर वही माँगे हुए लम्हे, फिर वही जाम-ए-शराब
फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब
फिर वही तारों की पेशानी पे रंग-ए-लाज़वाल
फिर वही भूली हुई बातों का धुंधला-सा ख़याल
फिर वो आँखें भीगी भीगी दामन-ए-शब में उदास
फिर वो उम्मीदों के मदफ़न[1] ज़िंदगी के आस-पास
फिर वही फ़र्दा[2] की बातें फिर वही मीठे सराब[3]
फिर वही बेदार[4] आँखें फिर वही बेदार ख़्वाब
फिर वही वारफ़्तगी[5] तन्हाई अफ़सानों का खेल
फिर वही रुख़्सार वो आग़ोश वो ज़ुल्फ़-ए-सियाह
फिर वही शहर-ए-तमन्ना फिर वही तारीक राह
ज़िन्दगी की बेबसी उफ़्फ़ वक़्त के तारीक जाल
दर्द भी छिनने लगा उम्मीद भी छिनने लगी
मुझ से मेरी आरज़ू-ए-दीद भी छिनने लगी
फिर वही तारीक[6] माज़ी फिर वही बेकैफ़[7] हाल
फिर वही बेसोज़ लम्हें फिर वही जाम-ए-शराब
फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब


उर्दू से लिप्यंतर : लीना नियाज

शब्दार्थ
  1. मक़बरा, समाधि
  2. आने वाला कल, भविष्य
  3. भ्रम
  4. निद्राविहीन
  5. ख़ुद अपने आप में खोया हुआ
  6. काला, अँधेरा
  7. उमंगहीन, जीवनहीन