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तस्कीन न हो जिस से / इक़बाल

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तस्कीन[1] न हो जिस से वो राज़ बदल डालो
जो राज़ न रख पाए हमराज़ बदल डालो

तुम ने भी सुनी होगी बड़ी आम कहावत है
अंजाम का जो हो खतरा आगाज़[2] बदल डालो

पुर-सोज़[3] दिलों को जो मुस्कान न दे पाए
सुर ही न मिले जिस में वो साज़ बदल डालो

दुश्मन के इरादों को है ज़ाहिर अगर करना
तुम खेल वो ही खेलो, अंदाज़ बदल डालो

ऐ दोस्त! करो हिम्मत कुछ दूर सवेरा है
गर चाहते हो मंजिल तो परवाज़[4] बदल डालो

शब्दार्थ
  1. तसल्ली
  2. शुरुआत
  3. दु:खी
  4. उड़ान