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ताँका 21-30 / रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

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21
आँसू की बोली
कब कुछ कहती
बिन बोले ही
ताप से पिंघलती
मोम बन ढलती
22
किसका वश
आँसू जब छलकें
बेबस होतीं
ये व्याकुल पलकें
धारा बन ढुलकें
23
मौन रहना
है आँखों का गहना
मुसकाकर
सारे दर्द सहना
कुछ भी न कहना
24
दु;ख सहके
छुपके पिये आँसू
सच सनझो
उम्र जी लिये आँसू
जख़्म सी लिये सारे
25
द्वार तुम्हारे
कितनी बार आया
कहना जो था
कभी कह न पाया
चुप्पी सह न पाया
26
तूफ़ान लाखों
थे अरमान लाखों
चूर हो गए
कुछ कर न पाए
जिये-मर न पाए
27
पथ में मिले
बहुत से काफ़िले
साथ में हम
कुछ दूर थे चले
गुम मंज़िल हुई
तुमको पा न सके
28
मेरे दर्द में
तुम्हारे आँसू बहे
ये क्या हो गया -
ज्यों ही तुमने छुआ
दर्द गुम हो गया
29
मिली न छाया
था मन भरमाया
धूप बहुत
यह बैरागी मन
था जीवन का धन ।
30
धूप कोसते
बन्धु क्यों है चलना
सच होता है
ये उगना ढलना
सबको गले लगा
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