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तालमखाना / सुधा गुप्ता

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आएगा फिर
हरा, सुगन्ध भरा
ताल मखाना ।
श्वेत गुलाबी
खिले कमल-दल
पोखर फूला

भीनी खुशबू
सुरंग मधुरिमा
भँवरा भूला
हरित नाल
में लटक झूलता
ताल मखाना ।
कुछ दिन को
परिश्रमी बालक
रोज़ी पाएँगे

तैर-कूद वे
पोखर में घुसके
कुछ लाएँगे
हरी डिबिया
छिपा पड़ा है मीठा
ताल मखाना ।
कभी सिंघाड़े
कमल-फूल कभी
वे पा जाएँगे

दो-चार पैसे
बदले में मिलेंगे
कुछ खाएँगे
बेचेगा फिर
सजा टोकरी , बच्चा
ताल मखाना
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मोटा पाठ