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तिश्नगी धूप है, उजाला है / रवि सिन्हा

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तिश्नगी[1] धूप है, उजाला है
रूह ने तीरगी[2] में पाला है

हाफ़िज़े[3] की तहों से फिर मैंने
आज बाहर उन्हें निकाला है

आरज़ी[4] है वजूद मेरा भी
तू भी तारीख़ का निवाला है

रौशनी रात की चहेती है
दिन ने सूरज को आज टाला है

वो जो सूराख़ आसमाँ में है
गिर्द उसके भी एक हाला[5] है

ख़ुल्द[6] के ख़्वाब ख़ल्क़[7] के इम्काँ[8]
हमने इक नज़रिये में ढाला है

बहर[9] में एक सुगबुगाहट है
क़ाफ़िये[10] ने मोरचा सँभाला है

शब्दार्थ
  1. प्यास, लालसा (thirst, longing)
  2. अँधेरा (darkness)
  3. स्मरण शक्ति (memory)
  4. क्षणिक (temporary)
  5. आभामंडल (halo)
  6. स्वर्ग (heaven)
  7. लोग, सृष्टि (people, creation)
  8. संभावना (possibility, potential)
  9. छंद (meter in poetry)
  10. तुकांत (rhyme)