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तुमको कितनी जगह चाहिए / गोविन्द कुमार 'गुंजन'

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मैं लेटना चाहता था
अपने सोफे पर आराम से,
शायद थककर
दिनभर के काम से

पास ही लेटा था बेटा,
कब तक रखता वह भी खुद को समेटा

मैं थोड़ा फैला तो वह कसमसाया,
फिर झुंझलाया - ‘‘पापा, तुमको कित्ती जगह चाहिए?

मैं चौकता हूँ,
फिर सोचता हूँ -
सचमुच, मुझे कितनी जगह चाहिए?
मैं महसूस करता हूँ जगह की तंगी,
कितनी कम है जगह,
जहाँ हम सांस लेते है

बहुत सारी जगहों पर
नहीं हूँ मैं,
मगर मैं वहां धड़कना चाहता हूँ
मैं इतनी धड़कनों में
क्यों धडकना चाहता हूँ?
क्यों चाहता हूँ
इतनी सारी आँखों में
अपने लिए प्यार?

अजीब लगता है,यह देखकर
कि कितनी बड़ी बड़ी चीजों को
मिला करती है कितनी छोटी छोटी जगहें
आदतन गुड़मुड़ पड़े रहना भी
आराम देता है आदमी को,


मुझे चाहिए थी / जीने के लिए
कितनी बड़ी जगह
और मैं गुज़ारा कर रहा हूँ
कितनी छोटी सी जगह में?

मरने के बाद भले ही
काफी हो दो गज़ जमीन
आदमी को,
जीने के लिए तो
उसे चाहिए पूरी धरती
पूरा आसमान
सारे पेड़ और सारे फूल

मैं
महसूस करता हूँ
जगह की तंगी /और छटपटाता हूँ /
पूरे सफर भर
मेरे झोले में था हिमालय,
मगर
ठहरने के लिए
जाना पड़ा मुझे
चीटीं के बिलों में बनी हुई
धर्मशालाओं में

मुझे
कितनी जगह चाहिए थी
अपने कंधे से उतार कर
यह हिमालय रखने के लिए नीचे

मुझे कितनी जगह चाहिए थी
अपने पसीने से भीगे उस कमीज़ को
किसी रस्सी पर सुखाने के लिए
जिसके जेब से एक इंद्रधनुष निकालकर
मैं लपेट देना चाहता हूँ पूरी धरती की गोलाई पर

मगर
मैं किस लिए लेटना चाहता था
सोफे पर आराम से
थकना तो काम को था आदमी से,
मगर आदमी थकने लगा काम से

उधर
अंतरिक्ष में अपने वास्ते जगह तलाशते हुए
आदमी के राकेट साफ साफ कह रहे है
कि बहुत जल्द यह धरती भी बहुत छोटी पड़ जाएगी
आदमी को

अब
इतना बड़ा आदमी कैसे करेगा गुजर बसर
सोचता हूँ, और डरता भी हूँ, कहीं इसीलिए
तो गुड़मुड़ रहने की आदत नहीं डाल लेता है आदमी