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तुम्हारी बातों से / बर्णाली भराली

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तुम्हारी बातों की सीढी चढ़ते
हमको मिला शब्दों का इक गाँव

आसमान की चिड़िया
खेत की गाय-बकरी
तलब के कछुए और मछली और
हमारे घर के पिछवाड़े में लगे पेड़
सबने मानने से इंकार किया था
ऋतुओं का शासन

तुम्हारी बातों के नशे में
उसको मिला ओस भरा एक चौराहा
वीणा के तार की तरह झंकृत हो चुकी थी
ग्रीष्म में भी चाँदनी सी शीतल उसकी देह

सूखे पेड़ पर लटक रहा था रसदार फल
शायद वही है पेड़ ले कोटर की आत्मा
जिसकी खुशबू में टूट गयी थी शीत की नींद
तुम्हारी बातों के विराम चिह्न में आया था हेमंत
वह भूल गयी थी संकरे रास्ते का अंधकार
और दुःख भरी शाम की बातें
एक पुराणी ख़ुशबू धोने
उस दिन बारिश भी चली आई थी
बदल को छोड़ कर

देखो, तुम्हारी बातों की सीढी चढ़ते-चढ़ते
किस तरह बन गया शब्दों का एक गाँव.