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तुम्हारे प्रेम में गणित था–2 / लीना मल्होत्रा

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वह जो दर्द था हमारे बीच,
रेल की पटरियों की तरह जुदा रहने का
मैंने माना उसे
मोक्ष का द्वार जहाँ अलिप्त होने की पूरी सम्भावनाएँ मौजूद थी
और तुमने
एक समानान्तर जीवन
बस एक दूरी भोगने और जानने के बीच
जिसके पटे बिना सम्भव न था प्रेम

वह जो देह का व्यापार था हमारे बीच
मैंने माना
वह एक उड़न-खटोला था
जादू था
जो तुम्हे मुझ तक और मुझे तुम तक पहुँचा सकता था
तुमने माना लेन-देन
देह एक औज़ार
उस औजार से तराशी हुई एक व्यभिचारिणी मादा
जो
शराबी की तरह धुत हो जाए और
अगली सुबह उसे कुछ याद न रहे
या
एक दोमट मिटटी जो मात्र उपकरण हो एक नई फ़सल उगाने का ।