भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तुम्हीं पैरों का बंधन हो गए हो / रविकांत अनमोल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

किसी राधा के मोहन हो गए हो
किसी के दिल की धड़कन हो गए हो

मिरा आंगन महक उठ्ठा है तुमसे
मिरे आंगन का चंदन हो गए हो

हमें कल तक दिलो-जां मानते थे
हमारी जां के दुश्मन हो गए हो

तुम्हीं में बस गए हैं सारे अरमां
हमारे मन का आंगन हो गए हो

तुम्हें बनना था चलने की तमन्ना
तुम्हीं पैरों का बंधन हो गए हो