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तुम आओगी / राजेन्द्र देथा

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तुम आओगी इक दिन
यही उम्मीद लिए
घूमता रहता हूँ
थार के धवल धोरों में
और रेवड़ चराते ग्वालों से
तुम्हारे बखानों का पुलिंदा खोलता हूं कि
फिर यकायक यह सोचता हूँ
कि तुमने तो कहा था "राज को राज" ही रहने देना।
खुद से माफी मांग जा बैठता हूँ
थलवट की उस खेजड़ी की छांव में
जहां के कीट-कीड़े सताते है
ठीक तुम्हारी याद की तरहा !