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तुम तो करो ख़ता पे ख़ता, हो ख़ता मुआफ़ / शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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तुम तो करो ख़ता पे ख़ता, हो ख़ता मुआफ़
मैं क्यों ख़ता करूँ कि करूँ सो ख़ता मुआफ़

'कर दो ख़ता मुआफ़’ ये कहना ख़ता हुआ
दामन छुडा के कहने लगे 'लो ख़ता मुआफ़’

वो ही ख़ता, उठाती है, किरदार से, उसे
जिस शख़्स ने भी की है यहाँ जो ख़ता मुआफ़

रोशन इसी से होता है, किरदार का चिराग
ख़ुद चाहिये सुकून तो कर दो ख़ता मुआफ़

करके ख़ता, लबों पे, तबस्सुम सजाइए
शाहिद वो हँस के गुज़रें तो समझो ख़ता मुआफ़