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तुम भी कही भीगती होगी / पवन कुमार मिश्र

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सावन की सीली हवाएँ
जब तन से मेरे टकराती हैं,
तुम्हारी कोमल छुअन की यादें
मुझे पुकार जाती हैं ।
 
धुली और पनियल सड़को से
कॉफ़ी-हाउस आना,
घुमड़ते कारे बादलो की
फुआरों में भीज जाना ।
 
तुम्हारे बालो का गीलापन
मेरे कंधे पर होता था,
सारा रेगिस्तान मेरा
उस पल को ग़ायब होता था ।
 
तुम्हारे साथ बिताई हुई
हर शाम याद आती है,
जिस बात पर हँसी थी तुम
वो बात याद आती है.
 
आगे सावन बरसे ना बरसे
लेकिन बारिश लम्बी होगी,
मेरी आँखों के बादल से
तुम भी कही भीगती होगी....