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तुरन्त हटाओ यहाँ से इसे, इस वाविलास को !... / कंस्तांतिन कवाफ़ी / सुरेश सलिल

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सुन रहे हो न तुम लोग?
इसी की वजह से अपोलो का तेज नष्ट होता है ।

बढ़ो ! निकालो उसे खोद कर तत्काल,
ले जाओ कहीं भी, जहाँ मर्जी हो ।
ले जाओ ! फेंक आओ कहीं भी । यूँ ही नहीं चीख़ रहा,
अपोलो का कहना है कि मन्दिर का शुद्धीकरण हो ।’

हमने उठाए पवित्र अवशेष, और अन्यत्र ले गए
हमने उठाए पवित्र अवशेष और प्रेम व आदरपूर्वक ले गए ।
और उसके बाद उस मन्दिर का सारा वैभव धूल में मिल गया
अविलम्ब वहाँ एक प्रचण्ड ज्वाला दहक उठी
महाभयानक आग,
और मन्दिर व अपोलो, दोनों जलकर ख़ाक हो गए ।

ख़ाक धूल मूर्ति : कचरे के साथ फेंकी जाने के लिए
बमक उठा जूलियन और आसपास चारों ओर
अफ़वाह उड़ा दी — कर भी और क्या सकता था ?
कि हमने, याने ईसाइयों ने लगाई आग ।

कहने दो, जो भी वह कहें । साबित तो हुआ नहीं ।
कहने दो जो भी वह कहें !
मुख्य बात है : तूल उसी ने दी मामले को !

[1932-33]

यह कवाफी की अन्तिम कविता है। नवम्बर 1932 और अप्रैल 1933 के मध्य लिखी गई। इसका प्रथम प्रकाशन कवि के निधनोपरान्त हुआ।

इस कविता में वर्णित समय चौथी सदी ईस्वी का है। रोमन कैथोलिक चर्च के बढ़ते प्रभाव और उसके विरुद्ध पैगनवाद के असफल विद्रोह के स्वर इसमें सुने जा सकते हैं । विगत दो सहस्राब्दियों के दौरान सतत् तीव्र होते धार्मिक और साम्प्रदायिक वैमनस्य के अध्ययन की दृष्टि से भी इसका अपना महत्त्व है ।

जूलियन सीरिया का रोमन सम्राट [361-63 ई.] जन्मना ईसाई होते हुए भी पैगनवाद [बहुदेववाद मूर्तिपूजक] की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए प्रयत्नशील था । अन्तिओक के बिशप बाविलास [237-250 ई.] को उसके बलिदान के उपरान्त, दाफ़्नी के वनाँचल में स्थित अपोलो के मन्दिर-परिसर में दफ़नाया गया और वहाँ एक चर्च बना दिया गया । जुलाई 362 में जूलियन ने चर्च को ढहाने और बाविलास के अवशेष अन्यत्र से जाने का हुक़्म सुनाया। मात्र चार महीने बाद अपोलो के नव-निर्मित मन्दिर में रहस्यपूर्ण ढँग से आग लगी और मन्दिर जल कर राख हो गया ।
 
अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल