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तूं तेरी मन सोच मानवी / मनोज चारण 'कुमार'

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तूं तेरी मन सोच मानवी, मत ना उळझै चक्कर मैं।
क्यांठे खावै भरम भचीङा, सिर फूटैला टक्कर मैं।
गाफल होय मत ना झूमी, पङ मत जाज्ये चक्कर मैं।
टांग तुङा बैठला मुफत, क्यूं उळझावै फच्चर मैं।।

चालै ज्यूं चालण दे गाडो, आडो अडबळ देई ना।
कोई चायै कीं भी कैवै, मनङै ऊपर लेई ना।
गांठ बात री मत ना करज्ये, हियै मांयनै सेई ना।
सेंयां ढ़ीमर पाक उठैला, जोखिम कोई लेई ना।।

आ दुनियांदारी ओगणगारी नित रा ही भरमावैली।
सोच समझ पग धरी भायला, कदम कदम उळझावैली।
पाछो मुङ मुङ मती देखजे, हंस हंस के बतळावैली।
तूं चेतो राखी चूकी मत ना, चूक्यां गांठ लुटावैली।।

भीङ घणेरी नेङी होसी, मिनख घणेरा मिल ज्यासी।
हां जी हांजी कैवण आळा, आगै-पाछै हिल ज्यासी।
अधरातां बतळावण री भोळावण देता मिल ज्यासी।
टेम पङ्यां पण निजर नीं आवै, ओलै जायनै लुक ज्यासी।।

तूं ध्यान राखज्ये मिनख जूण मैं, कई जिनावर डोलै है।
घात करणियां दुसमी बण मिंतर, मीठा-मीठा बोलै है।
बात हमारी सुणज्ये मिंतर, चारण भेद ओ खोलै है।
सामी दीसै झूठ घणकरो, सांच उणां रै ओलै है।।