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तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा / राजीव रंजन प्रसाद

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आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा..

लाख मजबूरियाँ, मेरे मौला
जिसके रस्ते डिगा नहीं पाती
पाँव पैबंद लगा कर न थका
जिसकी छाती में ज़िन्दगी गाती
उसने कल रात मुझसे ये पूछा
चाँदनी कब तलक जलायेगी
आसमानों में ही हरा क्यों है
है धरा जो, वो अधमरा क्यों है

मैं हँसा, प्रश्न बो लिये तुमने
उत्तरों का तो झुनझुना होगा।
आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा॥

तुम हो जैसे कोई हसीं साकी
जाम पर जाम छलकती जाये
भोर परछाईयों में अक्स दिखे
खुद को नारी कहे, हया आये
तुमने परबत बना दिये बेशक
तुमने बाँधा जरूर नदियों को
तुमको हासिल रहा लहू केवल
फिर जिसे बेच दिया बनियों को

हाल अपना ये बाकमाल किया
जैसे मुर्गा कोई भुना होगा।
आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा॥

मुझको मालूम है तेरी बेटी
नुच गयी, बिक गयी बजारों में
और बेगार कर रहा बेटा
तेरी बीवी कहीं सितारों में
जिनकी खातिर तू जलता जाता है
उनको तुझसे भला मिला क्या है?
तू पसीनों को कीमती कह ले
उससे पतलून भी सिला क्या है?

तू पतंगा है, फँस गया जीवन
जाल मकडी नें यूँ बुना होगा।
आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा ।।

तेरे जैसे कई हज़ारों हैं
जुड सको तो चलो, लडें मिलकर
आजमाईश बाजु-ए-कातिल की हो
हाँथ थामे खंजरों में गडें मिल कर
कह तो दें हम हाकिमों से अब नहीं
बाप की जागीर सूरज है तुम्हारा
दूध तो बच्चों का हक होगा हमारे
नाग की अब पंचमी से है किनारा

आग का घी से सामना होगा
जलजला जल के गुनगुना होगा।
आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा॥

4.05.2007