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तेरे होने से ही तो था जहाँ, कोई कुछ कहे कोई कुछ कहे / सुरेश सलिल

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तेरे होने से ही तो था जहाँ, कोई कुछ कहे कोई कुछ कहे
तेरा अक्स ही तो है आस्माँ, कोई कुछ कहे कोई कुछ कहे

तेरे साथ में सरे राह भी था लगे कि मैं तो हूँ बाम पर
दरों बाम है तो मैं लामकाँ[1], कोई कुछ कहे कोई कुछ कहे

भले सुबह हो भले शाम हो, जिसे देखो वो ही बुझा-बुझा
न वो राह है न वो कारवाँ, कोई कुछ कहे कोई कुछ कहे

वो गली वो कूचा वो सायबाँ[2], जो कभी हमारे थे पासबाँ[3]
दिखें आज कैसे वो बेज़ुबाँ, कोई कुछ कहे कोई कुछ कहे

किसे होश था करें फ़ैसला कहाँ इब्तिदा कहाँ इन्तेहा
तेरा इश्क़ अब मेरा इम्तिहाँ, कोई कुछ कहे कोई कुछ कहे

शब्दार्थ
  1. बेघर
  2. छाजन
  3. रक्षक