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त्रिवेणी बह निकली / गुलज़ार

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त्रिवेणी बह निकली -
शुरू शुरू में तो जब यह फॉर्म बनाई थी, तो पता नहीं था यह किस संगम तक पहुँचेगी - त्रिवेणी नाम इसीलिए दिया था कि पहले दो मिसरे, गंगा-जमुना की तरह मिलते हैं
और एक ख़्याल, एक शेर को मुकम्मल करते हैं लेकिन इन दो धाराओं के नीचे एक और नदी है - सरस्वती

जो गुप्त है नज़र नहीं आती; त्रिवेणी का काम सरस्वती दिखाना है

तीसरा मिसरा कहीं पहले दो मिसरों में गुप्त है, छुपा हुआ है ।

१९७२/७३ में जब कमलेश्वर जी सारिका के एडीटर थे, तब त्रिवेणियाँ सारिका में छपती रहीं

और अब –
 त्रिवेणी को बालिग़ होते-होते सत्ताईस-अट्ठाईस साल लग गए ।