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था मकां-भर ही वो जिसको एक घर समझे थे हम / दरवेश भारती

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था मकां-भर ही वो जिसको एक घर समझे थे हम
यानी घुप अँधियार को ही तो सहर समझे थे हम

बदहवासी, बेरुख़ी, बेचैनी, बदहाली ही थी
था उधर सब्रो-सुकूं ही कब जिधर समझे थे हम

वक़्त की आँधी ने उसको भी हिलाकर रख दिया
घर की जिस बुनियाद को मज़बूततर समझे थे हम

क्या ख़बर थी चलते-चलते दम ब-लब आ जायेगा
ज़िन्दगी को एक सीधा-सा सफ़र समझे थे हम

तौबा, तौबा ये तरीक़ा, ये सलीक़ा, ये चलन
बेहुनर निकले वो जिनको बाहुनर समझे थे हम

राहे-मुश्किल को कहाँ सुलझाया उलझाया है और
उनको तो सुलझा हुआ इक राहबर समझे थे हम

अपने ही बेगाने तो बेगाने ही अपने हुए
जन्म के रिश्तों को ही 'दरवेश'अमर समझे थे हम