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दम घुट रहा है रात दिन की सर्द जंग से / शीन काफ़ निज़ाम

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दम घुट रहा है रात दिन की सर्द जंग से
बाहर निकाल दे मुझे ठंडी सुरंग से

इक चीख दब के रह गई आफ़ाक़[1] के करीब
निकलेगा पा-ए-फ़ील[2] क्या दहन-ए-निहंग[3] से

मुमकिन है ख़ाके-पा[4] का करे वो भी इंतज़ार
मिलता है उस का रंग भी पत्थर के रंग से

चख लूँ ये कह के चाट गया रोशनी तमाम
वो साँप मार सकेगा न तेगो-तुफ़ंग[5] से

खामोश बेजुबान सा मैं देखता रहा
शर्मा रही थी धूप भी चेहरों के रंग से

वो हाथ धो न बैठे बसारत[6] से एक दिन
जो खेलता है हल्क़-ए-अश्काले-रंग[7] से

होशो हवास अब के सुबकसर[8] हुए निज़ाम
आवाज़ जाने कैसी निकलती है चंग से

शब्दार्थ
  1. क्षितिजों
  2. हाथी का पाँव
  3. मगरमच्छ का मुँह
  4. पाँवों की मिट्टी
  5. तलवार और बंदूक
  6. दृष्टि
  7. रंगों की शक्ल के घेरे
  8. शर्मिंदा