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दरे-हबीब की तलब जुनूं में ढल के आ गई / संजय मिश्रा 'शौक'

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रचनाकार=संजय मिश्रा 'शौक' संग्रह= }} साँचा:KKCatGazal




           
दरे-हबीब की तलब जुनूं में ढल के आ गई।।
मेरी निगाहे-शौक़ की मुराद चैन पा गई।।

हमारे दिल का आबला था फूटना ही एक दिन।
उदासियों का रक़्स देखने बहार आ गई।।

तजल्लियों को देखने की ख़्वाहिशें बलंद थीं।
ज़्ारा सा अक्स देख कर ही रूह थरथरा गई।।

बुझा दिए थे मैंने बेवफ़ाइयों के सब चराग़्ा।
तुम्हारी याद आई तो बुझे दिए जला गई।।

ख़िज़्ाां के मंज़्ारों को देखते रहे चमन में हम।
हवा के बाज़ुओं में जब बहार कसमसा गई।।

क़दम बढ़ा दिए तो मुझको मंजि़्ालों ने ख़ुद छुआ।
अमल की आंच फिर मेंरे वजूद को जला गई।।

अदा-ए-शहरे दिलबरां को दखने का शौक़ था।
वो रूबरू हुआ तो क्यों नज़्ार षिकस्त खा गई।।

सितम की आग ने हमें जला के ख़ाक कर दिया।
चलो तुम्हारी रूह तो बड़ा सुकून पा गई।।

अता-ए रब है ‘शौक़’ को मताए-इख़्तिसार भी।
   जभी तो ख़्वाहिशात की परी को नींद आ गई।।