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दर्द बिन हम को कुछ इस आग से मक़सूद नहीं / इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन

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दर्द बिन हम को कुछ इस आग से मक़सूद नहीं
इश्क़ फीका है अगर ज़ख़्म नमक-सूद नहीं

हम से गर सर न हुआ अहल-ए-तकब्बुर का तो क्या
फ़ख़्र-ए-आदम है जो इबलीस का मसजूद नहीं

है उसी तेग़ के ज़ंगार का मरहम दरकार
और किसी तरह मेरे ज़ख़्म का बहबूद नहीं

बुत-परस्ती में मोवह्हिद न सुना होगा कभू
कोई तुझ बिन मेरा वल्लाह कि माबूद नहीं

देख कर मुझ को किसी आँख से आँसू न गिरा
ज़ाहिरा आतिश-ए-सौदा में ‘यक़ीं’ दूद नहीं