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दाँत / दिविक रमेश

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(बतर्ज : न हुआ, पर न हुआ मीर का अंदाज नसीब
जौक़ यारों ने बहुत जोर ग़ज़ल में मारा)

ख़बर है कि नहीं रहा एक अगला दाँत कवि त्रिलोचन का
न हुआ पर न हुआ अफ़सोस मीर का नसीब
सामने साक्षात् थे वासुदेव, कि न चल सका ज़ोर, यूँ मारा बहुत था ।
भाई, बाकी तो सब सलामत हैं, बेकार था, सो गया, अफ़सोस क्या ?
सुनो, शोभा के लिए अधिक होते हैं ये अगले दाँत, और भाई
त्रिलोचन और शोभा ! ऊँह ! वहाँ दिल्ली का क्या हाल है ?
सर्दियों में खासी कटखनी होती है सर्दी ।

कहूँ, यूँ तो वार दूँ दुनिया की तमाम शोभा आप पर
तो भी लगवा लें तो हर्ज ही क्या है, त्रिलोचन जी !

नकली ? जो मिलता है, उँह, यानी वेतन
या तो दाँत ही लगवा लूँ या फिर भोजन जुटा लूँ, महीने-भर का।

वेतन !
पर आप तो पाते हैं प्रोफेसर का !
ऐसा,
तो मैं चुप हूँ भाई
त्रिलोचन भीख तो नहीं माँगेगा ।

चुप ही रहा ।
ग़नीमत थी, नहीं मिली थी उपाधि उजबक की ।

क्या सच में शोभा के लिए होता है अगला दाँत, महज
और इसीलिए बेकार भी
कहा, काटने के भी तो काम आता है त्रिलोचन जी !
रहता तो काटने में सुविधा तो रही होती न ?

ठीक कहा, त्रिलोचन हँसे — मुस्कराने की शैली में —
तुम उजबक हो
काटने को चाकू होता है ।

अजीब उजबक था मैं भी
त्रिलोचन और काटना !
आता काटना तो क्या कटे होते चिरानीपट्टी से
क्या कटे होते हर वहाँ से
जहाँ-जहाँ से काटा जाता रहा है उन्हें !
नहीं जानता त्रिलोचन सहमत होते या नहीं इस बात पर
सो सोच कर रहा गया
और सपने को सपना समझ कर भूल गया
हालाँकि निष्कर्ष मेरे हाथ था —
त्रिलोचन और काटना !