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दिया रश्क आशुफ़्ता-हालों ने मारा / मेला राम 'वफ़ा'

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दिया रश्क आशुफ़्ता-हालों ने मारा
तिरे हुस्न पर मरने वालों ने मारा।

कभी दिल का मातम कभी आरज़ू का
मुझे नित-नए मरने वालों ने मारा।

हुआ ख़ून सीने में दिल हसरतों से
तमन्नाएँ बन कर ख़यालों ने मारा।

तिरा ही ख़याल उन को आठों पहर है
मुझे मेरे ही हम-ख़यालों ने मारा।

वही है अगर ऐ वफ़ा नज़्म-ए-हस्ती
तो क्या मारका मरने वालों ने मारा।