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दिल न क्यों ले बलाएं तुम्हारी / मेला राम 'वफ़ा'

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दिल न क्यों ले बलाएं तुम्हारी
दिलरुबा हैं अदाएं तुम्हारी

तुम को दिलशाद रक्खे ज़माना
आएं ठंडी हवाएं तुम्हारी

राह तकते हैं सावन के झूले
मुंतज़िर हैं घटाएं तुम्हारी

खून में हम को नहलाएंगी अब
ग़ैर से इल्तिजाएं तुम्हारी

ग़ैर से शोखियों बरमला हैं
क्या हुईं वो हयाएं तुम्हारी

बदगुमानी है तुम को हमीं से
जो क़सम भी न खाएं तुम्हारी

तुम हमारी वफ़ा आज़माओ
हम जफ़ा आज़माएं तुम्हारी

उठ चुका इस नज़ाकत पे खंज़र
बैठो बाहें दबाएं तुम्हारी

गाई जाती हैं ग़ज़लें 'वफ़ा' की
बंध रही हैं हवाएं तुम्हारी।