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दिल में उल्फ़त नहीं है तो फिर दोस्ती की अदा छोड़ दे / शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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दिल में उल्फ़त नहीं है तो फिर दोस्ती की अदा छोड़ दे
वार करना है सीने पे कर, दुश्मनी कर, दगा छोड़ दे

चाहे जैसे भी हालात हों, राह कितनी भी दुश्वार हो
ज़िंदगी के उसूलों पे चल, हार कर बैठना छोड़ दे

ये हक़ीक़त है तक़दीर से, जीत पाना भी मुमकिन नहीं
और ये भी मुनासिब नहीं, आदमी हौसला छोड़ दे

हक़ को हक़ के तरीके से ले जो ज़बाँ जिसकी है उसमें बोल
नर्म इतना भी लहजा न रख , सर उठा , इल्तजा छोड़ दे

तश्नगी की क़सम है तुझे, मैकदे को तू 'शाहिद' बना
पीते पीते न छुट पाएगी , आज साग़र भरा छोड़ दे