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दीवारें / सजीव सारथी

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मैं छूना चाहता हूँ तुम्हें,
महसूस करना चाहता हूँ –
तुम्हारा दिल,
पर देखना तो दूर,
मैं सुन भी नही पाता हूँ तुम्हें,
तुम कहीं दूर बैठे हो,
सरहदों के पार हो जैसे,
कुछ कहते तो हो जरूर,
पर आवाजों को निगल जाती हैं - दीवारें,
जो रोज एक नए नाम की,
खड़ी कर देते हैं "वो", दरमियाँ हमारे,
तुम्हारे घर की खिड़की से,
आसमां अब भी वैसा ही दिखता होगा ना...
तुम्हारी रसोई से उठती उस महक को,
पहचानती है मेरी भूख अब भी,
तुम्हारी छत पर बैठकर,
वो चांदनी भर-भर पीना प्यालों में,
याद होगी तुम्हें भी,
मेरे घर की वो बैठक,
जहाँ भूल जाते थे तुम-
कलम अपनी,
तुम्हारे गले से लग कर
रोना चाहता हूँ फ़िर मैं,
और देखना चाहता हूँ फ़िर,
तुम्हें चहकता हुआ –
अपनी खुशियों में,
तरस गया हूँ सुनने को,
तुम्हारे बच्चों की किलकारियाँ,
जाने कितनी सदियों से,
पर सोचता हूँ तो लगता है,
जैसे अभी कल की ही तो बात थी,
जब हम तुम पड़ोसी हुआ करते थे,
और उन दिनों
हमारे घरों के दरमियां भी फ़कत,
एक ईट पत्थर की,
महीन सी दीवार हुआ करती थी...बस...