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दुःख के चार कोने / मुइसेर येनिया

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मेरे दिल में एक जहाज़
डूब जाता है

समन्दर आगे बढ़ना छोड़ देता है

दर्द के कंकाल को
मिल जाती है देह

- इस दुनिया की तमाम छायाएँ
मेरे ज़ेहन पर गिर रही हैं -

मैं एक मानवीय तलछट हूँ
जो बढ़ा रही है रेत अपनी बाँहों पर

मेरी आत्मा के पास कोई दूसरा कोना नहीं
इस देह के बाहर रोने के लिए ।