भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

दुआ / अर्चना कुमारी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब हूक उठती है
तब मलाल उगता है
कि खंजरों की नोंक पर
जिस जिस्म को रखा गया
वही रुह की अलमस्तियों में
आजाद तन्हा फिरता रहा
खेल-खेल में चोट जो लगीं
तो उम्र सारी लग गयी
रेशा-रेशा सांस में चुभन हुई
कि उम्र सारी चुभ गयी
राह एक चलती रही
उम्मीद सी बुनती रही
होंठों पर मुस्कान बन
उम्र भर खिलती रही
उठे जब हाथ
दिल खुदा-खुदा हुआ
नजर झुकी सजदे में
शŽद भर दुआ-दुआ....