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दुख / निर्मल प्रभा बोरदोलोई

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शरद ऋतु में
खेतों से उठने वाली गंध
जैसे तैसे चलकर
जब पहुँचती है नथुनों तक
तो पा लेती हूँ मैं अपने पिता को ।

जब भी अनुभव करती हूँ
किसी दुकान से लाए गए
टटके तह खुले 'गामोशा' की गमक
तो जैसे वापस मिल जाती है माँ ।

कहाँ रख जाऊँगी मैं
स्वयं को
ओह कहाँ ?
अपने बच्चों के लिए ?