भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

दुनिया भर की लावैं बुराई और दूसरा काम नहीं / मेहर सिंह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पूत सुपात्र सपुत एक भतेरा चाहिएं बीस कुजाम नहीं।
दुनिया भर की लावैं बुराई और दूसरा काम नहीं।टेक

बाप और बेटा सास बहु के काण अर कादे भंग होगे
बहू भी जणै सास भी जणे पशुओं आले ढंग होगे
घर में पड़दा तण्या रहै ठारा बीस मलंग होगे।
कोये लिकड़ै कोये बड़े और दलिया ऊपर जंग होगे
जामण आले भी तंग होगे ठावे इनको राम नहीं।

किसे कै बैल किसे कै भैंस घर आ ग्या बंट वारे मैं।
कोये कोये बरतन भाण्डे ठाके जा बैठा पथवारे मैं।
बूढ़ा बुढ़िया दोनों रोवैं घर..............उसारे मैं
बुढ़िया फिरै जिडाई मरती मैं रात काट रही हारे मैं
इस कुन्बे कै बारे मैं रहया शरीर पै चाम नहीं।

घणा के जिकर करें इन दुनिया की राहियां का
किले पांच हकीकी ठारा संग मैं हक जमाइयां का
धरती बांटैं न्यारे हो ज्यां बांगड़ बाजै भईयां का
एक ओर नै बूढ़ा खड़या लखावै तोड़या औड़ तगाईयां का
समझणियां की मर हो गई मानै कोई गुलाम नहीं।

बुढ़ा बुढ़िया न्यों बतलाये के सुख हुआ पूतां का
जामे और पढ़ाये लिखाए गुह मूत कर्या ऊतां का
इस तै अच्छा तै बांझ भली थी यो लहन्डा ना होता कुतां का
बुढ़ा बुढ़िया दोनों चाल पड़े यो कुनबा छोड़ दिया सूतां का
कहैं मेहर सिंह जाट कपूतां का रहना चाहिये नाम नहीं।