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दुबली पतली जर्जर काया वक़्त ने कर दी कितनी भारी / पवनेन्द्र पवन

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दुबली पतली जर्जर काया वक़्त ने कर दी कितनी भारी
हाँफ़ उठा माँ को ढोने की जिस बेटी की आई बारी

किसके ज़िम्मे माँ की रोटी , किसके ज़िम्मे है बीमारी
रिश्तों का मैला कर लट्ठा बेटे बन बैठे पटवारी

माँ की खाँसी छींकें बलगम देख के बेटा यूँ चिन्तित है
बीवी,बच्चे,नौकर को भी लग जाए न यह बीमारी

जब तक अपना हित था सबको माँ लगती थी मीठा अमृत
खाड़ी तक जब आ पहुँची तो गंगा लगती सबको खारी

जीह्वा पर आ पाए न हरग़िज़ बात कोई भी आँखों देखी
राजमहल की हर माता को होना पड़ता है गाँधारी

कोई न कहता आओ बैठो कोई न सुनता बात उसकी
अपना घर भी माँ का जैसे हो कोई दफ़्तर सरकारी

एक न कोना शीशमहल में चैन से लेकर बैठें जिसमें
टूटा चश्मा, खण्डित गीता, खदरंगी -सी एक पटारी