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दूर अँधेरा हुआ रौशनी आ गयी / 'हफ़ीज़' बनारसी

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दूर अँधेरा हुआ रौशनी आ गयी
आप आये नई ज़िन्दगी आ गयी

कोई इक दूसरे का शनाशा नहीं
 हाय किस मोड़ पर ज़िन्दगी आ गयी
 
क्या निजामे-चमन है ज़रा देखिये
कोई रोया, किसी को हंसी आ गयी

इस क़दर बढ़ गईं उनकी ख़ुदबीनियाँ
इश्क़ वालों में भी ख़ुदसरी आ गयी

या नज़ारों में वह जाज़बीयत नहीं
या हमारी नज़र में कमी आ गयी

ग़ैर का ज़िक्र था ग़ैर की बात थी
आप की आँख में क्यूँ नमी आ गयी

चाँद तारे भी हैं महवे-हैरत 'हफ़ीज़'
बढ़ते-बढ़ते कहाँ बंदगी आ गयी