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देखो... नर्मदा को देखो / विवेक चतुर्वेदी

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अपनी कुशकाय देह से
पथरीली भूमि पर लेटी हुई है तपस्विनी
माँस, जो जल है क्षीण हुआ है
प्रस्तर खण्ड, जो अस्थियां हैं
दीख पड़ने लगी हैं

देह में विचरते मनुजों पशुओं को
अर्द्धउन्मीलित नेत्रों के
वात्सल्य से देखती है नर्मदा
नर्मदाष्टक और स्तुति पाठ के
घोर कोलाहल से
भग्न हो रहा है उसका ध्यान
उन्मादी आस्तिकों की पूजन समिधा में
उलझ गयी है केश राशि
अगर-धूम्र से म्लान हुआ जाता है शांत मुख

सीपियां, शंख, रेत जो मज्जाएँ हैं
खोद डाली गयी हैं
कोशिकाएं, मीन-कच्छप
दानवी यंत्रों से भयग्रस्त हो विदा हुई हैं

देवी की साधना के साक्षी होने
सुदूर देश से आते थे जो विहग
अब पथ भटक गये हैं

कूलों पर तपनिष्ठ वृक्ष
थे जो संरक्षक मुनि
अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए हैं
सूख रहे हैं
काष्ठागार में उनके शव

शांत तटों को अपनी उपस्थिति से
आक्रांत करते मठों से निस्तारित कलुष
कृष्णवर्णी कर रहा है नर्मदा की त्वचा
स्रोतस्विनी की गर्भ नाल से जुड़कर
बसे ग्राम नगरों के समवेत पातकों से
अंर्तधान होने को है यह यति
देखो ... नर्मदा को देखो।।