भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

देवै नें लियेॅ केकरही सोना रं कश्मीर रे / नवीन चंद्र शुक्ल 'पुष्प'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

देवै नें लियेॅ केकरही सोना रं कश्मीर रे
देवै नै बंटलेॅ आपनोॅ देशोॅ के तस्बीर रे

भारत माय के देहोॅ के कश्मीरो छेकैं अंग
हरी घुरी शिमला समझौता होतेॅ रहतै भंग
भारतके भागोॅ सें जुड़लोॅ छै जेकरो तकदीर रे
देवै नै लिये केकरहौ आपनोॅ है कश्मीर रे

भारत के कश्मीर छेकै कमल फूललोॅ बाग
रहि-रहि फूंकै छै दुश्मन दुश्मनी रोॅ आग
छुवेॅ नै देवै आपनोॅ सीमा केरोॅ लकीर रे
देवै नै बदलेॅ आपनोॅ देशोॅ के तस्वीर रे

भारत के भीतरी बातोॅ में जौने अड़ैतै टाँग
ओकरे माँथोॅ देवै बजाड़ी धरपट्टी डाँग
भारत सें लोहोॅ लेबोॅ तेॅ छेकै टेढ़ोॅ खीर रे
देभै नै बदलेॅ आपनोॅ देशोॅ के तस्वीर रे

खंड-खंड खुद होवै लेकिन रखवै देश अखंड
लियेॅ नै देवै केकरहौ आबेॅ भारत के भूखंड
सौ-सै ठो केॅ देखी लेतै आपनोॅ एकेक बीर रे
देवै नै बदलेॅ आपनोॅ देशोॅ के तस्बीर रे