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दोहा-पय धारी गुरू चरन कौ, मो मन में विश्वास / नाथ कवि

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गुरू वन्दना

दोहा-पय धारी गुरू चरन कौ, मो मन में विश्वास।
कविता मैं जानत नहीं, हौं कवियन कौ दास॥
कवि पय धारी गुरु किये, बल बुद्धि की खान।
मूरख जानै इन्हें, पण्डित और जवान॥
पण्डित और जवान, लड़ै कुश्ती अति नीकी।
कविताई की रीति हमन, इन्हीं ते सीखी॥
शीलवन्त गुणवान, ब्रह्मचारी व्रतधारी।
कहत ‘नाथ’ कर जोर विनय सुन लेहु हमारी॥