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दोहे-1 / अमन चाँदपुरी

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बचपन की वो मस्तियाँ, बचपन के वो मित्र।
सबकुछ धूमिल यूँ हुआ, ज्यों कोई चलचित्र।।

संगत सच्चे साधु की, अनुभव देत महान।
बिन पोथी बिन ग्रंथ के, मिले ज्ञान की खान।।

प्रेम-विनय से जो मिले, वो समझें जागीर।
हक से कभी न माँगते, कुछ भी संत फकीर॥

ज्यों ही मैंने देख ली, बच्चों की मुस्कान।
पल भर में गायब हुई, तन में भरी थकान।।

मंदिर मस्जिद चर्च में, जाना तू भी सीख।
जाने कौन प्रसन्न हो, दे दे तुझको भीख।।

खालीहांडी देखकर, बालक हुआ उदास।
फिर भी माँ से कह रहा, भूख न मुझको प्यास।।

लख माटी की मूर्तियाँ, कह बैठे जगदीश।
मूर्तिकार के हाथ ने, किसे बनाया ईश।।

कौन यहाँ जीवित बचा, राजा रंक फकीर।
अमर यहाँ जो भी हुए, वो ही सच्चे वीर।।

तुलसी ने मानस रचा, दिखी राम की पीर।
बीजक की हर पंक्ति में, जीवित हुआ कबीर।।

डूब गई सारी फसल, उबरा नहीं किसान।
बोझ तले दबकर अमन , निकल रही है जान।।