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दो पवित्र बहनें / बाद्लेयर / मदन पाल सिंह

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व्याभिचार और मौत दो मोहक बहनों का जोड़ा है
ये भरपूर चुम्बन और स्वस्थ बदन वाली यौवनाएँ
कुँवारी और पवित्र, तन पर चोगा लिए
यूँ अपना गुप्त गर्भ छिपाए रखती हैं,
कि इनका शिशु तो कव्भी जन्मा ही नहीं ।

अभागे कवि के लिए परिवार सिर्फ़ दर्द की विरासत बन गया है
वह तुच्छ धन, टुकड़ों पर पलकर
यूँ नरक का चहेता बन बैठा है ।
उसके रास्ते में आते हैं क़ब्र और वेश्यालयों के कुँज
हिचकियों में डूबा बिस्तर
दुख-दर्द ग्लानि के आँसुओं में, जो कभी रुके नहीं ।

क़ब्र, वासना का बिस्तर, जिन्हें इस निन्दा में सजा दिया है
दोनों बारी-बारी से सेवा में तत्पर हैं
जैसे दो प्यारी बहनों का स्पर्श,
एक दे तीखा आनन्द,
दूसरी शान्त मधुरता से भर देती है ।

मुझे बता दो, ओ मलिन बाँहों वाली हवस !
कब दफ़न करोगी तुम ? मुझे यूँ भोगकर !
तुम कब आओगी मौत ? वासना की मोहक प्रतियोगी !
कब उसकी दूषित मेंहदी[1] पर रोपोगी
तुम अपने श्याम सनोबर[2] ?

अँग्रेज़ी से अनुवाद : मदन पाल सिंह

शब्दार्थ
  1. मेंहदी की तरह का औषधीय गुणों से युक्त एक पौधा, जिसे फ़्रांसीसी भाषा में मिर्त या मिर्च के नाम से जाना जाता है। यूरोप में इस पौधे की शाखाओं से विवाह के गुलदस्ते भी बनाए जाते हैं। इस पौधे को देवी वीनस और देवराज जूपीटर का प्रिय पौधा भी माना गया है।
  2. सनोबर या सरू के पौधे को मृत्य और आत्मा की शाश्वतता से जोड़ा जाता है। क़ब्रिस्तान में या क़ब्रों के आसपास इन पौधों को रोपने की परम्परा है।इसके साथ ही धार्मिक या महान व्यक्तियों के ताबूतों को सजाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है।