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धुरी नहीं धरती घूमा करती है भाई / हरीश भादानी

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धुरी नहीं
धरती घुमा करती है भाई !!!
एक घड़ी का बादल
एक बहाना भर है,
आधे क्षण की सांझ
अधूरी छलना
अँधियारा तो दृष्टि दोष है, भाई !
और सुबह भी
नींद जगाने का सपना है
एक बार जलकर
सूरज की ईधन बुझा नहीं करती है भाई !
छाया
मिलती है केवल झुरमुट के नीचे
फिसलन होती है
केवल काई पर
मौसम खुरच-खुरच जाते हैं तनको
गर्म मुहानों से आती
सासों की अपनी भी क्षमता होती है
मन के संकल्पित पठार पर
कोई असर नहीं होता है भाई !
धुरी नहीं
धरती घुमा करती है भाई !