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नग्न तरुवर मैं हूँ नहीं / कविता भट्ट

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नग्न तरुवर मैं हूँ नहीं
शरद में ठिठुरता विकल
जिजीविषा हूँ कोंपलों की-
मैं वसंत की प्रतीक्षा प्रबल ।
अश्रु लेकर कल खड़ा था
पीत-पतझर की राह में
सहलाएगा गर्म सूरज
अब भरके अपनी बाँह में ।
बर्फ अवसादों की थी जो,
अब हँसी से गल जाएगी
ऊषा अब उन्मुक्त है;
शीत-निशा ढल जाएगी ।
किरणें कोमल पीठ पर जब
अपनी उँगलियाँ फेरेंगी
गुदगुदाती लिपट लूँगी
जब तीखी हवाएँ हेरेंगी ।
मुक्त हूँ- जड़ बंधनों से
मैं हूँ सरस होंठों की छुवन
दिव्य-प्रेम पथ की नर्तकी हूँ
थिरक-थिरक करती हूँ नर्तन।
बाँधकर आशा के घुँघरू
मदमस्त अब जो पग धरे
गुंजित होंगे पर्वत-शिखर
गाएँगे प्रेम-तरु हरे-भरे।