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नज़्म कहाँ रखी है मैंने / जयंत परमार

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मेज़ के ख़ानों में
टेबल पर
रैक पे, अलमारी में
और बुकशेल्फ़ पे
कब से ढूँढ़ रहा हूँ
नई-पुरानी किताबों के
औराक़े-जुनूँ में
खद्दर के कुर्ते की
फटी-फटी जेबों में
ऊँट के चमड़े के बस्ते में
नज़्म कहाँ रखी है मैंने?

पूछता हूँ फिर :
नेरूदा से, एमीचाई से, रिल्के से
अभी-अभी तो रखी थी!
नज़्म को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते ही मिल जाते हैं
क़लम, दवात और कोरे काग़ज़
लेकिन नज़्म
बयाज़े-दिल[1] से ग़ायब है!

शब्दार्थ
  1. बयाज़ अर्थात‍ याददाश्त की कॉपी।