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नदी की धार चट्टानों पे, जब आकर झरी होगी / ललित मोहन त्रिवेदी

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नदी की धार चट्टानों पे जब आकर झरी होगी !
तभी से आदमी ने बाँध की साज़िश रची होगी !!

तुझे देवी बनाया और पत्थर कर दिया तुझको !
तरेगी भी अहिल्या तो चरण रज़ राम की होगी !!

मरुस्थल में तुम्हारा हाल तो उस बूँद जैसा है !
जिसे गुल पी गए होंगे जो काँटों से बची होगी !!

कहीं पर निर्वसन है और निर्वासन कहीं पर है !
नहीं कुछ फ़र्क है, तू द्रोपदी या जानकी होगी !!

धुएँ को देखनेवालों, ज़रा सा गौर से देखो !
यहीं पर आँच भी होगी, यहीं थोड़ी नमी होगी !!

तुम्हारी शख्सियत अंधों का हाथी ही रही हरदम !
मिठासों की कहानी है जो गूंगे ने कही होगी !!