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नदी के सौदागर के नाम एक चिट्ठी / ली बो, ली पो, ली बाई, रि हाकू / आग्नेय

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यद्यपि अब सीधे कटे हुए हैं मेरे केश
मैं पुष्पों को तोड़ती खेलती हूँ
सामने के गेट के आस-पास

तुम आते हो अश्व बनकर खेलते हुए
मैं जहाँ बैठी थी
वहीं पर आ जाते हो नीले आलूबुखारों से खेलते
और हम इसी तरह रह जाते हैं चोकान के गाँव में
दो मामूली लोग बिना किसी घृणा या शंका के

जब मैं चौदह बरस की थी
मेरे मालिक मैंने तुमसे विवाह कर लिया
मैं कभी हँसती नहीं थी क्योंकि मैं शर्मीली थी
मैं अपना सिर नीचे किए दीवार की तरफ देखती रहती
हजार बार पुकारने पर भी
मैं पीछे मुड़कर नहीं देख पाती थी

पन्द्रह बरस की होने पर
मैंने तेवर दिखाने बन्द कर दिए
और मैं कामना करने लगी कि
मेरी धूल तुम्हारी धूल में समा जाए
सदा के लिए, सदा के लिए, सदा के लिए

काहे को मैं चढ़ती तुम्हें तकने के लिए
मेरे सोलह होने पर तुमने विदा ले ली
तुम दूर क्यू तो येन तक चले गए
भँवरों से भरी उस नदी तक
और तुम पाँच माह के लिए चले गए
मेरे सिर के ऊपर बन्दर उदासी भरी आवाज़ें करते

जब तुम जा रहे थे
तुम अपने पैरों को घसीट रहे थे

अब गेट के पास सेवार उग आए हैं
कई तरह के सेवार उग आए हैं
वे इतने घने हैं कि उनको साफ़ नहीं किया जा सकता
इस हेमन्त ज़रा जल्द ही पतझर आ गया
तेज़ हवाएँ चलने लगीं
जोड़ा बनाए तितलियाँ

अगस्त आते ही
पश्चिमी बगीचे की घास
पीली हो चुकी है
वह मुझे व्यथित करती है
अब मैं बुढ़ा गई हूँ

अगर तुम कियाँग नदी की
सैकड़ों जलधाराओं से आते हो
मुझे पहले से ही बता देना
मैं चली आऊँगी
तुमसे मिलने चो-फू-सा तक

’रि हाकू’ के नाम से इस कविता के एजरा पाउण्ड द्वारा अनूदित अँग्रेज़ी अनुवाद से हिन्दी में आग्नेय द्वारा अनूदित