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नरगिस / गुलाम नबी ‘फ़िराक़’

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बहुत-बहुत बधाई है तुझे
तू फूली-फली और यौवना हुई
बड़भागी थी कि जो यहाँ आई
पर तुम नहीं होती, तो हमारा समय इतना तेज़ नहीं भागता
जब जो तुम आई हो
तो यह तुम्हारे पास नहीं रूकेगा
तुम्हारी आयु है कितनी ? कितनी समझ लें
बस एक सुबह और एक शाम ही तो
ज़िन्दा हो तो एक सुबह भर के लिए अैर एक शाम के लिए
शाम होने के बाद मैं तेरी यह नियति किससे कहूँ
कौन समझेगा मेरी यह बात

अभी तुम्हारा दिन है
और भीतर तुम्हारे अग्नि तप रही है
तुम्हारा हृदय जाग रहा है और तुम्हारी दुनिया बनी हुई है
पर जो अभी तुम्हारा अपना है, उसे नहीं भूलना

या तुम्हारी देह चाँदनी ढली हुई है
या फिर बढ़ई ने तारे से तराशा है तुम्हें
या स्वर्गीय आभा की लौ थिरा गई है
तुम कजरारी आँखों में मस्ती का पोषण करती हो

भौरे की गुनगुनाहट पर तुमने प्राणों की बलि दी
अच्छा किया
देखना कोई अभिलाषा अधूरी न रह जाए तुम्हें ललसाई नज़रों से न देखे
याद रखो
अपने कामनाओं भरे हृदय को
सदा प्रसन्न रखना होगा
अपनी प्रेमाग्नि को तपा
अपनी इच्छाएँ पूर्ण कर
अपने स्नेह भरे आस-पास को
प्रज्वलित कर

तुम्हारी आयु
तो एक सुबह और एक शाम से ज़्यादा क्या मानें
ज़िन्दा हो तो एक सुबह और एक शाम है तुम्हारी आयु
जब शाम हो जाएगी तो मैं [1] किससे कहूँ
कौन सुनेगा मेरी यह बात ?

शब्दार्थ
  1. तुम्हारी यह कथा