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नहीं मैं ये नहीं कहता कोई अधिकार लिख देना / सूरज राय 'सूरज'

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नहीं मैं ये नहीं कहता कोई अधिकार लिख देना।
मेरे हिस्से में अपने दर्द का संसार लिख देना॥

बहुत ऊंची है वह गारे से ईंटों से बहुत ऊंची
दिलों में बस ग़लतफ़हमी से जो दीवार लिख देना।

नहीं है ताक़ते-बर्दाश्त उसमें वह सिकन्दर है
लकीरों में बस उसकी चार दिन परिवार लिख देना

यक़ीं दुनिया की बातों से जो डांवाडोल हो मुझपे
मेरे सर के लिये पहले कोई तलवार लिख देना॥

ज़रूरी है यक़ीं ख़ुद पर बहुत परदेस में बेटे
इसे तुम ज़िंदगी की जंग का हथियार लिख देना॥

भिगो न पाए जिसको बादलों की कोई भी बारिश
वहाँ माँ ने कहा बस आँसुओं की धार लिख देना।

मिटाना ख़ुद को पड़ता है हज़ारों बार काग़ज़ से
मियाँ आसान लगता है तुम्हें अशआर लिख देना

ग़ुलामी उसके जीते-जी अंधेरों की करें अपने
दिया हो या हो वह "सूरज" उसे धिक्कार लिख देना॥