भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

नहीं / मोईन बेस्सिसो / उज्ज्वल भट्टाचार्य

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उसके घावों ने कहा :
नहीं !
उसकी ज़ंजीरों ने कहा :
नहीं !

और उसके सीने पर एक कपोत, जिसने उसे
अपने सारे पर सौंप दिए
अपने घाव ढकने को, उसने कहा :
नहीं !

हर बेचने और ख़रीदने वाले के लिए : नहीं
पैरों की बेड़ियों के लिए : नहीं
उन सबके लिए नहीं जिन्होंने गाज़ा का दर्पण तोड़ दिया
और उसके टुकड़ों को बेचकर एक बत्तख ख़रीद लिया

ओ बत्तख !
एक लमहे के लिए ख़ामोश रहो
ताकि सुन सको कि वह कहता है :
नहीं !

अफ़सोस कि उसकी मौत
चमकती रोशनी में नहीं हुई
मशाल और चान्द के बीच नहीं
अफ़सोस कि अख़बार में उसकी ख़बर नहीं छपी
कफ़न के साथ लोग नहीं और कसीदा नहीं

ओ पत्थरो !
इजाज़त दो कि कविता की एक पँक्ति लिख सकूँ
लम्बी दाढ़ी और नकली दाढ़ीवालों को कहने के लिए :
एक लमहे के लिये ख़ामोश रहो
ताकि सुन सको कि वह कहता है
नहीं !

घर की दीवार अपनी अन्तड़ियों के साथ खिड़कियों से चिपकती है
वह सफ़र के लिये नहीं चल पड़ती ।

जर्मन से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य